महाप्रताप का धनी किंतु, कर्ण रण में हारा ।
दूषित संगति के वन में, फंसा रहा बेचारा ।।
सत्यनिष्ठ और दानवीर , जग में गौरव कमाया ।
दृष्टा बन वो चीर हरण में ,अपनी जान गँवाया।।
इसीलिए संगति को अपने, रखो शुद्ध और साफ ।
दृष्टा भी बनना धर्म हनन में, होता है महापाप ।।
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