क्या गाँधी का स्वतंत्रता संग्राम या वर्तमान भारत में कोई योगदान है ?

 यूँ तो यह लेख मैने दो वर्षों पहले लिखा था, किंतु कुछ लोग लगातार यह प्रश्न कर रहे हैं , गाँधी ने क्या किआ ?जब यह प्रश्न आता है तो कभी कभी लगता है वाकई भारत वैचारिक गरीबी से जूझ रहा है क्या ?


और जब यह प्रश्न कोई युवा करता है तो इस प्रश्न का उत्तर हाँ से देता हुआ प्रतीत होता है। 

गाँधी के न रहने पे भी आज गाँधी का सत्याग्रह जीत रहा है , अगर ऐसे आंदोलन पाकिस्तान में होते तो इस आंदोलन का स्वरूप क्या होता यह बात हम सब जानते है । तो फिर भी इस बेहतरीन देश के प्रणेता पे सवाल खड़ा करना वैचारिक गरीबी नही तो और क्या है ?


खैर, इसे पढ़िए जांचिए और अंतरात्मा से पूछिए क्या गाँधी ने कुछ नही किया ?


 गांधी ! "मोहनदास करमचंद गांधी"  जब एक नाम क्रांति बन जाए तो उस शख्सियत की महानता का अंदाजा लगाया जा सकता है ।

यूं तो कई आंदोलन हुए कई क्रांतियां हुई कई शहीद भी हुए किंतु यह पहली बार था जब एक आम नागरिक अपना सहयोग पूरी ताकत से अपनी स्वतंत्रता के लिए दे सकता था ।

क्रांति लाना पहली बार शायद आम नागरिकों के हाथ में था अन्यथा इतिहास में यह देखने को मिला है कि हम राजाओं पर ही पूर्णता निर्भर थे , की युद्ध होगा तो वही करेंगे,  क्रांति होगी तो वही लाएंगे , जो होना है उनसे होना है हम तो कठपुतली हैं कभी वो राजा हमे चलाया था अब यह राजा चलाएंगे । परिवर्तन राजाओं का है हमारी जीवन दशा का नहीं । 



जब ट्रेन की बोगी से फेंके जाने पर एक शख्सियत गिर के खड़ा होता है,  तो वह क्या क्रांति ला सकता है इसका जीता जागता उदाहरण पूरे विश्व ने गांधी के रूप में देखा है । वह क्रांति उसी पल खत्म होसकती थी इस सोच के साथ कि आज यह फेंका कल मैं इसे फेंकूँगा इस सोच के साथ गांधी समाप्त हो सकते थे ।

 एक संगठनात्मक दृष्टि से देखा जाए , एक केंद्रीयकरण की दृष्टि से देखा जाए तो गांधी वह चेहरा थे जिन पर सभी उम्र सभी तबके के लोगों का भरोसा था। आज़ादी के सभी नेतृत्व करता शुरुआती तौर पर गांधी से ही प्रेरित होते,  अर्थात क्रांति की शुरुआत का दूसरा नाम कभी गांधी थे । 'साहस' और 'धैर्य'  यह बहुत ही सामान्य शब्द प्रतीत होते हैं किंतु इन शब्दों को अपने आचरण में उतारना टेढ़ी खीर ही है । हम अगर आदर्शो के लिए अपनों से विरोध लेना और विरोधियों के मन में भी अपने लिए एक सम्मान पैदा करना यह किसी से सीखा है तो आधुनिक भारत मे गांधी से । यह वह दौर था जहां पर विदेशी हुकूमत के पास कई तरीके थे हमे रोकने के , तोड़ने के हमे सशक्त ना होने देने के।  अगर हमें कह दिया जाता कि वह दलित है क्या  वह आज साथ में बैठकर के क्रांति की लड़ाई लड़ेगा ?तो शायद हमारे भीतर का अहंकार यह कह बैठता की हुह क्रांति हमारा ठेका है वह कौन होते है लड़ने वाले ।  तब हम उस निचले तबके माने जाने वाले लोगों को अपनी लड़ाई में भी शामिल ना करते । भारत मे अंग्रेज़ो के खिलाफ लड़ाई द्वितीय थी सर्वप्रथम लड़ाई थी खुद के खिलाफ , अंग्रेजो से लड़ाई जीतना आसान था मुश्किल था खुद के खिलाफ फ़तह पाना । तब उन धारणाओं उन मान्याताओं के खिलाफ समाज को एक नई दिशा देने का काम गांधी जी ने किया । 




गांधी जी कोई चमत्कार नहीं है गांधी जी एक ऐसी कोशिश है जो कई वर्षों के तप,  सही दिशा में मेहनत,  और खुद से सत्य के रूप में परिभाषित होते है । सत्यता  ,  दृढ़ता लाती है यह सुना तो था लेकिन देखा हमने गांधी जी के रूप में ,  हजारों की संख्या में अस्त्र-शस्त्र हो , शासन हो,  प्रशासन हो , कई अन्याय के बाद अपनों के खोने के बाद अपनी दृढ़ता , समाज के प्रति संदेश,  और उसकी जिम्मेदारी को पूर्ण सत्यता के साथ निभाना अगर हमें किसी ने सिखाया है तो वह गांधी जी ने सिखाया है । गांधी जी ने सिखाया कि यह जरूरी नहीं हम अपना हक हत्या करके ले,  किसी और के जीने का हक छीन के अपना हक लेना किसी और की खुशी छीन करके अपनी खुशी लेना यह मानवता के लिए अभिशाप है, यह गांधी ने समझाया इसकी समझ अब भी हमें आम जीवन में देखने को मिलती है। सत्याग्रह , अनशन यह गांधी जी की दृढ़ता की देन है अन्यथा इन तरीकों पर हंसने वालों की कोई कमी नहीं । वह दौर ऐसा था जिसमें यह साबित हो चुका था हथियार नहीं तो कुछ नहीं, हिंसा नहीं तो जीत नहीं,  उस दौर में जीत का एक नया तरीका मानवता को एक नया पथ प्रदान करने का काम अगर किसी ने किया तो गांधी जी उन सब में एक प्रमुख चेहरा थे । 

पड़ोसी मुल्क के पास अपना हक लेने का अधिकार धोखा के रूप में प्रस्तुत हुआ तो आज उनके हालात देखिए और हमारे मुल्क में सरकार पर भरोसे के रूप में प्रस्तुत हुआ तो आज हमारे हालात देखिए । जब हम अपनी सरकार से कुछ मांगे रखते हैं तो हम उसे अपना हक समझते हैं और सरकार हमें वह प्रेषित करने में अपना गुणगान ही समझती है।  किंतु पड़ोसी मुल्कों में सत्ता परिवर्तन का खेल कभी सेना का राज कभी लोकतंत्र की हत्या यह आम मामला है जो  यह साबित करता है कि हमारी प्रेरणा कौन है ,  साबित करता है कि प्रेरणा किस तरीके से चरित्र को प्रभावित करती है । एक व्यक्ति को इतनी शक्ति देना कि वह फौज से दृढ़ता के साथ लड़ जाए उस शक्ति की चेतना का नाम गांधी है ।


 एक व्यक्ति को इतना साहस देना कि वह करोड़ों विरोधियों के सामने सच की आवाज बन जाए उस साहस के प्रणेता का नाम गांधी है ।  एक व्यक्ति को सत्यता का मूल्य बताना उस गुरु का नाम गांधी  है । आज गांधी जी  के डेढ़ सौवे जन्मदिवस पर हमें यह दृढ़ता लानी चाहिए,  जो परिवर्तन है वह हमसे है,  समाज है वह हमसे है , यह देश है वह हमसे है , अर्थात हम परिवर्तनशील होंगे तो यह देश परिवर्तनशील होगा । हम प्रगतिशील होंगे तो यह देश प्रगतिशील होगा।   ।। जय हिंद जय भारत ।।

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