ओ री सखी तू सुन मेरी : उत्कर्ष नाथ गर्ग




 ओ री सखी तू सुन मेरी , 

मेरे भाव मे है धुन तेरी ।

तू राग रागिनी की बाला , 

मै मधुसूदन बंसी वाला ।।

तू राधा बन के आई है , 

क्या नया संदेशा लाई है ?

मै श्याम बना हु तेरे लिए ,

 यह धाम रचा हु तेरे लिए ।

हम एक न हो पाते है ,

 हम क्या संदेश सुनाते हैं ?

साथ नही तो एक नही ? 

साथ रहे तो एक कही ?

यह दुनिया सोच इतना ही पाती है , 

यह भौतिकता में समाती है ।

भौतिक तन सत(सौ) साल है , यह भाव अनंत काल है ।

तू क्यों घबराए जाती है ?, 

क्या  बात सताए जाती है ?

तू सोच तनिक धीरज रख के , भौतिकता में चादर ढक के ।

क्या मन यह मारा जाता है ? 

क्या तन सब दिन समाता है ?

जो एक है हम भाव से , 

हम क्यों सोचे पर भाव(प्रभाव) से 

तू कर विचार उनसे हटके , 

जो है खुद भटके भटके ।

तू साथ मुझे ही पाएगी एक नया संदेशा लाएगी ।

ओ री सखी तू सुन मेरी ....

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