ओ री सखी तू सुन मेरी : उत्कर्ष नाथ गर्ग
ओ री सखी तू सुन मेरी ,
मेरे भाव मे है धुन तेरी ।
तू राग रागिनी की बाला ,
मै मधुसूदन बंसी वाला ।।
तू राधा बन के आई है ,
क्या नया संदेशा लाई है ?
मै श्याम बना हु तेरे लिए ,
यह धाम रचा हु तेरे लिए ।
हम एक न हो पाते है ,
हम क्या संदेश सुनाते हैं ?
साथ नही तो एक नही ?
साथ रहे तो एक कही ?
यह दुनिया सोच इतना ही पाती है ,
यह भौतिकता में समाती है ।
भौतिक तन सत(सौ) साल है , यह भाव अनंत काल है ।
तू क्यों घबराए जाती है ?,
क्या बात सताए जाती है ?
तू सोच तनिक धीरज रख के , भौतिकता में चादर ढक के ।
क्या मन यह मारा जाता है ?
क्या तन सब दिन समाता है ?
जो एक है हम भाव से ,
हम क्यों सोचे पर भाव(प्रभाव) से
तू कर विचार उनसे हटके ,
जो है खुद भटके भटके ।
तू साथ मुझे ही पाएगी एक नया संदेशा लाएगी ।
ओ री सखी तू सुन मेरी ....


Superbly penned 🌌✨💜
ReplyDeleteLaconic...💜
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