वो सदा गुरु ही है : उत्कर्ष नाथ गर्ग




 गहन अंधकार से, पड़े हर विकार से ,

जो जीव को निकाल दे, वो सदा गुरु ही है ।


तमस भरे मनो में है, भटकता वनों में है,

जो सात्विकता का मार्ग दे, वो सदा गुरु ही है ।


राग द्वेष से भरा, ये पापी तन था खड़ा,

जो पुण्य वाणी सींच दे, वो सदा गुरु ही है । 


दृष्टि को सर्वदा भय रूप ही था मिला ,

जो दिव्य मार्ग दिखा ही दे, वो सदा गुरु ही है ।


मोह माया जाल में, झूठे से इन काल मे,

जो आत्मदर्शन करा ही दे, वो सदा गुरु ही है ।


हैसियत नही बड़ी ,काया है बस दो घड़ी,

वर्तमान ही सत्य है ,भविष्य मिथ्या सी पड़ी ।

स्व से सह स्वीकार ले ,  अस्तित्व तेरा है यही,

जो सत्य ये बयां करे वो सदा गुरु ही है । 


है नमन गुरु को जो हर रूप विद्यमान है, 

करू जो दर्शन हर घड़ी, वो ईश के समान है ।

कृपा दया बनाइये,सत्यता दिखाइए ,

चक्षुओं को दिशा दे स्वदर्शन कराइये ।

 चक्षुओं को दिशा दे स्वदर्शन कराइये । 

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