लड़किया , प्रशाशन और सरकारें ................ : उत्कर्ष
इस समाज में लडकियां होती हैं दमन के लिए , कैद के लिए।
कैद में रहने वाली सभी लड़कियों को सभ्य कहा जाता है।
कहा जाता है वो अनुशाषित हैं , किन्तु असल में वह प्रशासित हैं। प्रशाशन उन्हें हर वक़्त यह बताता है की उनकी मर्यादाएं क्या हैं। फिर उन्ही मर्यादाओ को वह आने वाली सरकारों के सामने सफलता के पैमानों के तौर पे प्रस्तुतु करता है।
प्रस्तुत करते हैं एक सुन्दर सा छाया चित्र जिसमे लड़की अच्छी दिखे , जिसे सहेज के बनवाया गया था सरकारों के शहज़ादों के लिए।
अपनी बेटी की फोटो को बड़ी सरकारों के घरो तक पहुंचाना प्रशाशन सफलता मानता है।
यह पच्चीस वर्ष का टेन्योर जब २६वे में पहुँचाने लगता है , तो वह प्रशाशन तनिक गंभीर होजाता है। क्यूंकि सरकारों को यह पसंद नहीं , उन्हें रूप , यौवन , विवेक , सब चाहिए। उन्हें नहीं चाहिए तो केवल आज़ादी , उसकी मुस्कान , उसकी सच्चाई। पहले सच्चाई पाउडर लगा के दबाई जाती थी आज फोटो शॉप से , एक पाउडर प्रशाशन भी लगाता है जिसे अंत में वह लड़की भी अपना असल रूप स्वीकार करती है , स्वीकार करती है शाशन प्रशाशन की वह सभी बातें और शर्ते जो उन्होंने लगाई हैं , उसी में हँसाना उसी में रोना उसी में जीवन व्यतीत करना। क्यूंकि थोपी हुई बातो को नियति के तौर पे स्वीकार करना एक सहज प्रक्रिया है तो बस कर लो ............
एक बात और सरकारों को कई प्रांतो में रिश्वत (दहेज) भी दी जाती है , केवल स्वीकृति के लिये .......................
बस अंत में ये कहूंगा क्यूंकि विरोध हो सकता है , यह बात अधिकांश सरकारों और प्रशाशन के लिए है पूर्ण नहीं इसको दो बार ** लगा के कंडीशन में दाल लीजिएगा लेख पढ़ने के बाद ............
: उत्कर्ष

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ReplyDeleteGrave irony of condition of feminine . Our every authority centred institution , from our govt to our societies , all have absence of feminine qualities like compassion , empathy etc . That's why they are percieved in such a way .
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