गण तंत्र और जनतंत्र में एक बहस.. (हिंदी कविता) : उत्कर्ष नाथ गर्ग
" गण तंत्र और जनतंत्र में एक बहस.."
UTKARSH NATH GARG
गण तंत्र और जनतंत्र में एक बहस सी छिड़ गई ।
संसद संसद लड़ते लड़ते सड़को पे भिड़ गई ।
एक बोला लागू मुझको हुए 73 साल
कौन है तू ? भीड़ है साले क्यों मचाता बवाल
जनतंत्र कुछ सहमा सा हुआ तनिक गम्भीर
बोला भाई गणतंत्र तू क्यों होता है अधीर ।
मिली विरासत तुझको कागज़ के कुछ पोथों से
महँगे महँगे जूतों वाले राजशाही होंठो से ।
नंगे बदन पे गमछा डाले लोकतंत्र मचल गया
धीरे धीरे भाग्य समझ उसी रंग में ढल गया ।
हाँ वही रंग जो शोषण के बीजों से आता है ,
हाँ वही रंग जो साहूकार के ब्याज में घुल जाता है ,
हाँ वही रंग जो चोर उचक्के ओढ़े संसद जाते है
कमीशनखोरी के धंधे को अपना हक बतलाते हैं ।
हाँ हाँ वही रंग जो लाचारी में हर चुनाव में छाता है,
कागज़ पे गांधी को देखे हर भूखा बिक जाता है ।
पर भूखा उसको रखा है किसने , किसकी है ये चाल ?
गणतंत्र पे उठ गया देखो एक नया सवाल ।
कहते हो तुम दिए है हमने हर गण को अधिकार
फिर दिल्ली की सड़कों पे क्यों मचा है हाहाकार ?
मचा था हाहाकार क्यों निर्भया के मन मे
हाथरस की बेटी के घर मे और जीवन में ।
कौन भला देरहा गणों को एक नया आकार
जाती धर्म का भेद कराते इन्ही के ठेकेदार ।
चुप्पी साधे बैठ गया फिर कोने में गणतंत्र
दूजा कोना पकड़े बैठा मौन रहा जनतंत्र
दोष भला फिर किसका है ,किसका है अपराध
कहाँ कमी रह गई भला जो साध सके तो साध ।
साध भला यह कमी की फिरसे इंकलाब का प्रण हो
जन गण मन अधिनायक जय के लिए फिर अंतिम रण हो ।
उत्कर्ष नाथ गर्ग

This sattire just blew my mind away, it filled me with a faith in myself,showed me the power of Gandhi and the image of a failed Gov.
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