गणतंत्र और जनतंत्र में एक बहस सी छिड़ गई...
गणतंत्र और जनतंत्र में एक बहस सी छिड़ गई ....
गणतंत्र और जनतंत्र में एक बहस सी छिड़ गई ....
संसद संसद लड़ते लड़ते सड़को पे भिड़ गई ।
एक बोला लागू मुझको हुए 74 साल !
कौन है तू ? भीड़ है साले क्यों मचाता बवाल |
जनतंत्र कुछ सहमा सा हुआ तनिक गम्भीर ...
बोला भाई गणतंत्र तू क्यों होता है अधीर ?
मिली विरासत तुझको कागज़ के कुछ पोथों से ,
महँगे महँगे जूतों वाले राजशाही होंठो से ।
नंगे बदन पे गमछा डाले लोकतंत्र मचल गया ,
धीरे धीरे भाग्य समझ उसी रंग में ढल गया ।
हाँ वही रंग जो शोषण के बीजों से आता है ,
हाँ वही रंग जो साहूकार के ब्याज में घुल जाता है ,
हाँ वही रंग जो चोर उचक्के ओढ़े संसद जाते है,
कमीशनखोरी के धंधे को अपना हक बतलाते हैं !
हाँ हाँ वही रंग जो लाचारी में हर चुनाव में छाता है,
कागज़ पे गांधी को देखे हर भूखा बिक जाता है !!
पर भूखा उसको रखा है किसने , किसकी है ये चाल ?
गणतंत्र पे उठ गया देखो एक नया सवाल ।
कहते हो तुम दिए है हमने हर गण को अधिकार ,
फिर दिल्ली की सड़कों पे क्यों मचा है हाहाकार ?
मचा था हाहाकार क्यों गोधरा की सड़कों में ,
कश्मीरी पंडित के घर मे और जीवन में ।
कौन भला दे रहा गणों को एक नया आकार ?
जाती धर्म का भेद कराते इन्ही के ठेकेदार ..!!
चुप्पी साधे बैठ गया फिर कोने में गणतंत्र ..
दूजा कोना पकड़े बैठा मौन रहा जनतंत्र ..
दोष भला फिर किसका है, किसका है अपराध ?
कहाँ कमी रह गई भला जो साध सके तो साध ...!
साध भला यह कमी की फिरसे इंकलाब का प्रण हो...
जन गण मन अधिनायक जय के लिए फिर एक रण हो ..
जन गण मन अधिनायक जय के लिए फिर एक रण हो ...
उत्कर्ष नाथ गर्ग
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