गुलाब : उत्कर्ष नाथ गर्ग

गुलाब .....

सोचा तुम्हे गुलाब दूँ ...

पर लाश फूल की करोगे क्या ?

मीठे मीठे ख्वाब दूँ ...

पर स्वप्न में रह के करोगे क्या ?

मानव इतिहास का सबसे प्रीतम भेंट तुम्हें मैं देता हूँ 

संघर्ष तुम्हें मैं देता हूँ , मैं साथ तुम्हारा लेता हूँ ।

दे सको अगर तुम साथ मेरा ऊँची नीची पतवारों में ,

अंधड़ झंझा के विषम काल मे और घने अँधियारो में ।

तो शूल बिछे हो पथ में भी उन्हें फूल समझ मैं सह लूँगा ,

हो युद्ध भले घनघोर बड़ा परिणाम मैं उसका विजय दूँगा ।

उत्कर्ष नाथ गर्ग ....✍️✍️

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